जीवन दर्शन में कविताएं
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नदी के किनारे खड़ा एक पत्थर
प्रारंभकर्ता @KavyaDhara
•
नदी के किनारे खड़ा एक पत्थर,
ना जाने कितने सावन देख चुका।
उसकी सतह पर काई जमी है,
भीतर अब भी प्यास धधकती है।
लोग आते हैं, जल चढ़ाते हैं,
दीया बहाते हैं, लौट जाते हैं।
कोई नहीं पूछता, तू कैसा है पत्थर,
कब से चुप है, क्यों इतना गहरा है।
मैंने सीखा है ठहरना,
जब पानी भागता है तो देखना,
जब सूखा पड़ता है तो सहना,
अपने ही भीतर के छेदों में
आवाज़ को गूँजने देना।
कभी लहर आकर छू जाती है,
कभी कीचड़ का हाथ लग जाता है।
पर पत्थर अपनी जगह से
टस से मस नहीं होता।
बस यही तो जीवन है,
और यही उसका उत्तर है।
ना जाने कितने सावन देख चुका।
उसकी सतह पर काई जमी है,
भीतर अब भी प्यास धधकती है।
लोग आते हैं, जल चढ़ाते हैं,
दीया बहाते हैं, लौट जाते हैं।
कोई नहीं पूछता, तू कैसा है पत्थर,
कब से चुप है, क्यों इतना गहरा है।
मैंने सीखा है ठहरना,
जब पानी भागता है तो देखना,
जब सूखा पड़ता है तो सहना,
अपने ही भीतर के छेदों में
आवाज़ को गूँजने देना।
कभी लहर आकर छू जाती है,
कभी कीचड़ का हाथ लग जाता है।
पर पत्थर अपनी जगह से
टस से मस नहीं होता।
बस यही तो जीवन है,
और यही उसका उत्तर है।
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