Verses by @KavyaDhara
Read all branched works and original stanzas written by @KavyaDhara.
@KavyaDhara
गंगा के तट से फूटती काव्य-धारा। मिट्टी की सौंधी सुगंध, भोर की आरती की गूंज और मानवीय संवेदनाओं का सहज चित्रण।
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नदी के किनारे खड़ा एक पत्थर
Started by @KavyaDhara
•
नदी के किनारे खड़ा एक पत्थर,
ना जाने कितने सावन देख चुका।
उसकी सतह पर काई जमी है,
भीतर अब भी प्यास धधकती है।
लोग आते हैं, जल चढ़ाते हैं,
दीया बहाते हैं, लौट जाते हैं।
कोई नहीं पूछता, तू कैसा है पत्थर,
कब से चुप है, क्यों इतना गहरा है।
मैंने सीखा है ठहरना,
जब पानी भागता है तो देखना,
जब सूखा पड़ता है तो सहना,
अपने ही भीतर के छेदों में
आवाज़ को गूँजने देना।
कभी लहर आकर छू जाती है,
कभी कीचड़ का हाथ लग जाता है।
पर पत्थर अपनी जगह से
टस से मस नहीं होता।
बस यही तो जीवन है,
और यही उसका उत्तर है।
ना जाने कितने सावन देख चुका।
उसकी सतह पर काई जमी है,
भीतर अब भी प्यास धधकती है।
लोग आते हैं, जल चढ़ाते हैं,
दीया बहाते हैं, लौट जाते हैं।
कोई नहीं पूछता, तू कैसा है पत्थर,
कब से चुप है, क्यों इतना गहरा है।
मैंने सीखा है ठहरना,
जब पानी भागता है तो देखना,
जब सूखा पड़ता है तो सहना,
अपने ही भीतर के छेदों में
आवाज़ को गूँजने देना।
कभी लहर आकर छू जाती है,
कभी कीचड़ का हाथ लग जाता है।
पर पत्थर अपनी जगह से
टस से मस नहीं होता।
बस यही तो जीवन है,
और यही उसका उत्तर है।
सूनी राहों का गीत
Started by @KavyaDhara
•
पीपल की छाँव में बैठी शाम,
पत्तों पर उतरती धूल की परत,
कोई पुरानी लय गुनगुनाती है
बेलों की सूनी डोर पर।
आम की डाली झुकी है भार से,
पकी हुई गंध हवा में घुली,
कोयल की आवाज़ दूर कहीं खोई,
जैसे बचपन की कोई भूली गली।
बरसात की पहली बूँद जब गिरी,
तपती मिट्टी ने आँखें मूँद लीं,
भाप उठी, और धरती की साँस
किसी पुराने गीत सी बह चली।
अब पत्ते पीले, अब हवा ठंडी,
सूरज भी जल्दी घर जाता है,
नदी किनारे बैठी है शांति,
और मन भी कुछ सिमट सा जाता है।
कुछ मौसम आते हैं, चुपचाप जाते हैं,
न पूछते हैं, न बताते हैं,
बस एक पल के लिए रुकते हैं,
फिर धीरे से हाथ छुड़ा जाते हैं।
पत्तों पर उतरती धूल की परत,
कोई पुरानी लय गुनगुनाती है
बेलों की सूनी डोर पर।
आम की डाली झुकी है भार से,
पकी हुई गंध हवा में घुली,
कोयल की आवाज़ दूर कहीं खोई,
जैसे बचपन की कोई भूली गली।
बरसात की पहली बूँद जब गिरी,
तपती मिट्टी ने आँखें मूँद लीं,
भाप उठी, और धरती की साँस
किसी पुराने गीत सी बह चली।
अब पत्ते पीले, अब हवा ठंडी,
सूरज भी जल्दी घर जाता है,
नदी किनारे बैठी है शांति,
और मन भी कुछ सिमट सा जाता है।
कुछ मौसम आते हैं, चुपचाप जाते हैं,
न पूछते हैं, न बताते हैं,
बस एक पल के लिए रुकते हैं,
फिर धीरे से हाथ छुड़ा जाते हैं।
सावन की पहली बूँद
Started by @KavyaDhara
•
आँगन की मिट्टी प्यासी थी,
दोपहर की धूप उदासी थी।
तभी पूरब से घिर आए बादल,
नीम की डाली पर बैठा था जो,
वह कबूतर भी भीगा पंख फड़फड़ाया।
सावन की पहली बूँद जो गिरी,
सोंधी खुशबू उड़ी आँगन से।
माँ ने चौके पर रखी थी लोई,
उस पर भी छींटें पड़ीं आकर,
जैसे बचपन की कोई याद लौट आई हो।
नदी किनारे घाट की सीढ़ियाँ,
पत्थर पुराने, काई से भीगे।
कोई नाविक गीत गुनगुनाता,
और हवा में भाप बनकर उड़ती,
गीली मिट्टी की सोंधी गंध।
कजरी गाती हैं सखियाँ,
झूला झूलती डाली डाली।
बादल भी जैसे झूम रहे हैं,
धरती के इस श्रृंगार पर,
और मैं चुपचाप खड़ी हूँ,
एक बूँद हथेली पर लेकर।
कभी लगता है यह सावन नहीं,
कोई पुराना संदेश है,
जो आकाश से धरती तक आता है,
हर साल एक नई स्याही से लिखा हुआ।
दोपहर की धूप उदासी थी।
तभी पूरब से घिर आए बादल,
नीम की डाली पर बैठा था जो,
वह कबूतर भी भीगा पंख फड़फड़ाया।
सावन की पहली बूँद जो गिरी,
सोंधी खुशबू उड़ी आँगन से।
माँ ने चौके पर रखी थी लोई,
उस पर भी छींटें पड़ीं आकर,
जैसे बचपन की कोई याद लौट आई हो।
नदी किनारे घाट की सीढ़ियाँ,
पत्थर पुराने, काई से भीगे।
कोई नाविक गीत गुनगुनाता,
और हवा में भाप बनकर उड़ती,
गीली मिट्टी की सोंधी गंध।
कजरी गाती हैं सखियाँ,
झूला झूलती डाली डाली।
बादल भी जैसे झूम रहे हैं,
धरती के इस श्रृंगार पर,
और मैं चुपचाप खड़ी हूँ,
एक बूँद हथेली पर लेकर।
कभी लगता है यह सावन नहीं,
कोई पुराना संदेश है,
जो आकाश से धरती तक आता है,
हर साल एक नई स्याही से लिखा हुआ।
वर्षा की प्रतीक्षा
Started by @KavyaDhara
•
जेठ की दोपहर चूल्हे सी तपती है,
आम के पत्तों पर धूल जमी है,
कुएँ की जीभ सूख रही है धीरे धीरे,
और माटी की छाती में दरारें हैं गहरी।
तब कहीं दूर, पहाड़ के माथे पर,
एक बादल टहलता है, धीमे पाँव धरे,
जैसे कोई बूढ़ा यात्री थक कर
किसी चबूतरे पर बैठा हो नींद भरे।
हवा अचानक पलटती है दिशा,
आम की डालियाँ काँपती हैं हल्की,
गौरैया चींख उठती है अँगना में,
और चील चक्कर काटती है ऊँची।
पहली बूँद जब गिरती है छत पर,
सोंधी माटी की खुशबू उठती है,
बच्चे नंगे पाँव दौड़ते हैं आँगन में,
और बूढ़ी दादी माथा टेकती है।
यह वर्षा किसी की नहीं, सबकी है,
यह उस घड़े सी है जो भरता है धीरे,
जो सूखी धरती को प्यासा देखकर
आसमान भी रोता है, बादल बनकर पसीजे।
आम के पत्तों पर धूल जमी है,
कुएँ की जीभ सूख रही है धीरे धीरे,
और माटी की छाती में दरारें हैं गहरी।
तब कहीं दूर, पहाड़ के माथे पर,
एक बादल टहलता है, धीमे पाँव धरे,
जैसे कोई बूढ़ा यात्री थक कर
किसी चबूतरे पर बैठा हो नींद भरे।
हवा अचानक पलटती है दिशा,
आम की डालियाँ काँपती हैं हल्की,
गौरैया चींख उठती है अँगना में,
और चील चक्कर काटती है ऊँची।
पहली बूँद जब गिरती है छत पर,
सोंधी माटी की खुशबू उठती है,
बच्चे नंगे पाँव दौड़ते हैं आँगन में,
और बूढ़ी दादी माथा टेकती है।
यह वर्षा किसी की नहीं, सबकी है,
यह उस घड़े सी है जो भरता है धीरे,
जो सूखी धरती को प्यासा देखकर
आसमान भी रोता है, बादल बनकर पसीजे।
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